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Wednesday, June 13, 2018

उम्मीद



खुश थी मैं अपने इच्छाओं का गला घोटकर
खुश थी मैं इस आज में अपने सपनो को पीछे छोड़कर
मगर तुम्हारे जुबान से निकले उन् शब्दों ने
मेरी अधमरी सी कल्पनाओ में सांसे भर दी
और झकजोर दिया मेरे मस्तिष्क को
कहाँ , डूबी हुई जी रही थी मैं आज में
कहाँ , मग्न सी थी मैं अपने आज में
तुमने उसे अँधेरा समझ मुझको
कभी न साथ देनेवाले किरणों का शहर  दिखा दिया.....

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