खुश थी मैं अपने इच्छाओं का गला घोटकर
खुश थी मैं इस आज में अपने सपनो को पीछे छोड़कर
मगर तुम्हारे जुबान से निकले उन् शब्दों ने
मेरी अधमरी सी कल्पनाओ में सांसे भर दी
और झकजोर दिया मेरे मस्तिष्क को
कहाँ , डूबी हुई जी रही थी मैं आज में
कहाँ , मग्न सी थी मैं अपने आज में
तुमने उसे अँधेरा समझ मुझको
कभी न साथ देनेवाले किरणों का शहर दिखा दिया.....

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