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Wednesday, January 5, 2011

What is real????

एक ऐसी शक्ति,एक ऐसा विश्वास जिसपर ये दुनिया आँखे बंद करके यकीन करती है..हर कोई चाहता है की वो अपनी ज़िन्दगी में इतना आगे बढ़ जाये की उस तक कोई दूसरा पहोच भी गया तो उससे आगे न पहोच पायें..मगर कुछ लोग ऐसे भी होते है जो ये सोचते है की हमसे किसीका जितना भला हो सके उतना करे...खैर दुनिया की भीड़ भलेही ज्यादा हो मगर उससे कई ज्यादा उनकी सोच,समाज,उनके बनाये रीती,नियम,और कानून और सबसे बड़ा समाज.ये  वो "समाज" शब्द है जिसे बनाया तो लोगो ने है,और तो और उसके हिस्से बी किये है,,समाज के नाम पर लोगोने अपनी पहेचन को किश्तों किश्तों में बाटा है...

बचपनसे ही हर इंसान अपने आनेवाली और अपनी पैदाईश  नस्ल को ऐसी परवरिश देता है जिसके बाद हर शक्स अपनी समाज और अपने पहेचान के साथ ज़िन्दगी जीता भी है और उन्ही तौर तरीको को अपनाता भी है...जब हम छोटे होते है बड़ो की बताई हुई हर बात मान लेते है और खुश होते है..और जैसे ही हमे सबकुछ तो नहीं मगर कुछ samaz  में आने लगता है, जब हम सही और गलत में फर्क महेसूस करने लगते है और जो हमारा दिल सही  महेसूस करता है हम वैसा ही करना पसंद करने लगते है...लेकिन फिर भी हम अपनी पहेचान को,अपने समाज को भूलते नहीं है..उनके बनाये हुए नियमो को तोड़ भी नहीं सकते... और  ऐसा  करने  पर  बहोत  सी  मुश्किलों  का  सामना  भी  करना  पड़ता  है...

ऐसा ही एक क्या कहे कई वाकिये हुए है जिन्हें कभी हमने भी महेसूस किया है...२००९ में एक international peace conference (IRF) ISlamic reaserch foundation  में गए थे..वहा जानेसे पहेले तक दिल में कई सवाल थे..कुछ अलग सी सोच थी..जैसे सुना था तो यही लगा था की Dr . Zakir Naik जो एक worldwide हस्ती है उनसे जब सवाल-जवाब हुए तो पता चला की हम जैसे साधारण लोगोमे बहोत सी गलत फहमिया है..बहोत बड़े सही और गलत के भवर में डूबे हुए है...सही और गलत की तो अभी बहोत से फर्क पता ही नहीं... वहा जाने के बाद पता चला की यहाँ हर कोई अपने अपने कानून को चलाना चाहता है ...
    
यहाँ हर कोई अपनी अपनी बुद्धि का गलत भी और शायद  सही भी इस्तमाल करते है..अपने अपने समाज को हर कोई दुनिया की भीड़ में सबसे ऊपर पहोचाना चाहता है...सच तो यही है न की जितने लोग उतने ही धर्म है इस धरती पर..हर धर्म में नजाने कितने महागुरु...और जाने-नजाने कितने संत..जो असलमे तो संत शायद ही हो मगर उन्होंने महानता का किताब हासिल जरूर हासिल किया हुआ है...जो लोगो को आधा अधूरा ज्ञान बाटते फिरते है..
सच तो ये है की दुनिया में कहिये या फिर इस धरती पर कितने ही धर्म क्यों न हो और कितने ही धर्मग्रन्थ क्यों न हो मगर सभी ग्रन्थ और सभी धर्म एक ही बात कहेते है...एक ही उपदेश होता है हर धर्म का...

नजाने फिर क्यों हर धर्म,हर ग्रन्थ को अलग अलग कहा जाता है..लोग किस बात पर यकीन करे...सच क्या है..एक तरफ विज्ञानं है जो कहेता की भगवन ही नहीं क्यों की विज्ञानं को चलने वाले अपने आपको सही साबित करनेमे लगे हुए है...और एक तरफ धर्म को,समाज को चलने वाले संत और धर्मगुरु...जो अपने आपको महँ बताते है...क्यों की वो भी अपने धर्म और अपने समाज को सर्व श्रेष्ठ बताना चाहते है...ताकि यहाके लोग उन्ही के बताये हुए रास्तो पर चले .....ईश्वर के नाम पर उनके नाम की भी पूजा हो...क्यों की सच तो यही है न हर कोई यहाँ श्रेष्ठ बनाना चाहता है...शायद.......

सच क्या है ,सही क्या है?? क्या ये सच है जिसने दुनिया बनायीं है वो भगवान है...???या फिर वो जो  कहेते सबकुछ तो ईश्वर ने बनाया है ईश्वर हर रूप में हर रंग में बसता है..इसीलिए हर चीज़ भगवान का रूप है..क्या वो लोग जो अपने अपने धर्म को श्रेष्ठ बताने में लगे हुए है...क्या सच है???
शायद यही के चाहे जो भी सच हो और सही हमे एक ही रह पर चलना है और उपदेश को एक ही ग्रन्थ से निकले हुए एकही वचन है ये मान कर चलना है...फिर भी दिल में  एक ही सवाल उठता

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